nandini-scripting-story-self

हिमालयी जड़ी-बूटियों से आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहीं नंदिनी, ‘हिमालयन त्वचा’ से स्थानीय उत्पादों को दे रहीं पहचान

उत्तराखण्ड

नैनीताल, 19 अक्टूबर । उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा और पारंपरिक ज्ञान को स्वरोजगार से जोड़कर युवा उद्यमी आत्मनिर्भरता की नई राह बना रहे हैं।

नैनीताल जिले हल्द्वानी निवासी बीएससी बायोटेक्नोलॉजी की छात्रा नंदिनी भी इसी दिशा में प्रयासरत हैं। उन्होंने ‘हिमालयन त्वचा’ नाम से अपना उद्यम शुरू कर हिमालयी जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक सामग्री से हस्तनिर्मित साबुन तैयार करने की पहल की है। उनका प्रयास स्थानीय संसाधनों को नए बाजार तक पहुंचाने के साथ युवा उद्यमिता की संभावनाओं को भी सामने लाता है।

नंदिनी के उद्यम में बुरांश, सी-बकथॉर्न, केसुड़ा, नीम, एलोवेरा, मिक्स फ्रूट और गोट मिल्क यानी बकरी के दूध सहित विभिन्न प्रकार के साबुन तैयार किए जाते हैं। इन साबुनों को बनाने में कैस्टर ऑयल, नारियल तेल, शीया बटर और कोकोआ बटर जैसे घटकों का उपयोग किया जाता है। साबुन सैपोनिफिकेशन प्रक्रिया से तैयार किए जाते हैं। इस तरह प्राकृतिक सामग्री और आधुनिक निर्माण प्रक्रिया को जोड़कर उत्पाद तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है।

उत्पादों को पौधों की पत्तियों में लपेटकर जूट के धागों से बांधा जाता है। इससे उत्पादों की प्रस्तुति में स्थानीय परंपरा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का मेल दिखाई देता है।

नंदिनी के अनुसार उनके लिए हिमालय केवल प्राकृतिक संसाधनों का क्षेत्र नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। वह हिमालयी जड़ी-बूटियों से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक उद्यमिता से जोड़कर उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। उनकी यह पहल युवाओं के सामने उपलब्ध स्थानीय संसाधनों को रोजगार और व्यवसाय के अवसरों में बदलने की संभावनाओं को भी रेखांकित करती है।

नंदिनी बताती हैं कि राज्य सरकार के प्रयासों से उन्हें सरस मेले सहित विभिन्न मेलों में अपने उत्पादों के प्रदर्शन और बिक्री के लिए स्टॉल तथा मंच उपलब्ध हो रहे हैं। इन आयोजनों से उन्हें नए ग्राहकों तक पहुंचने, उत्पादों की पहचान बनाने और अपने उद्यम को आगे बढ़ाने का अवसर मिल रहा है।

‘हिमालयन त्वचा’ की पहल स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और युवा उद्यमिता के समन्वय की एक प्रेरक मिसाल बन रही है। नंदिनी का प्रयास बताता है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संपदा को रचनात्मक सोच और उद्यमशीलता से जोड़कर स्वरोजगार के नए अवसर तलाशे जा सकते हैं। ऐसी पहलें स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाने और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की दिशा में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।