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सौ डॉलर से नीचे पहुंचा ब्रेंट क्रूड, डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 90 डॉलर से नीचे फिसला

दिल्ली

नई दिल्ली, 22 सितंबर । अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब दो सप्ताह तक तेजी दिखाने के बाद ब्रेंट क्रूड आज एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से नीचे पहुंच गया। इसी तरह वेस्ट टेक्सास इंटरमीडियट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी आज फिसल कर 90 डॉलर के स्तर से नीचे चला गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड आज गिर कर 97.53 डॉलर के स्तर तक पहुंच गया। वहीं, डब्ल्यूटीआई क्रूड 89.16 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ गया।

ब्रेंट क्रूड ने आज बिना किसी बदलाव के 100.34 डॉलर प्रति बैरल के सपाट स्तर से कारोबार की शुरुआत की। ट्रेडिंग शुरू होने के बाद ये कुछ देर के लिए उछल कर 102.22 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक भी आया, लेकिन थोड़ी देर बाद इसकी चाल में गिरावट आ गई। कीमत मे आई इस कमजोरी के कारण ब्रेंट क्रूड देखते ही देखते 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से भी नीचे गिर कर 97.53 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। भारतीय समय के मुताबिक शाम 7:15 बजे ब्रेंट क्रूड 2.37 डॉलर प्रति बैरल यानी 2.36 प्रतिशत की गिरावट के साथ 97.97 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

इसी तरह डब्ल्यूटीआई क्रूड ने आज 0.10 डॉलर प्रति बैरल फिसल कर 92.27 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से कारोबार की शुरुआत की। ओपनिंग के तुरंत बाद ये उछल कर 93.84 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ गया लेकिन इसके बाद इसकी चाल में कमजोरी आ गई। कुछ देर में ही यह गिर कर 89.16 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। भारतीय समय के अनुसार शाम 7:15 बजे डब्ल्यूटीआई क्रूड 2.87 डॉलर प्रति बैरल यानी 3.11 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 89.50 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

कमोडिटी मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि सितंबर के महीने में लगभग दो सप्ताह तक लगातार 100 डॉलर के ऊपर कारोबार करने के बाद ब्रेंट क्रूड का इस स्तर से नीचे आ जाना भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी राहत देने वाली खबर है। कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आना वैश्विक बाजार के लिए बड़ा टर्निंग पॉइंट भी साबित हो सकता है।

अमेरिका और ईरान द्वारा सितंबर के दूसरे सप्ताह में एक-दूसरे के ठिकानों पर हमला करने के बाद से ही कच्चे तेल की कीमत में जोरदार तेजी का रुख बना हुआ था। कमोडिटी मार्केट एक्सपर्ट मयंक मोहन का कहना है कि ऊंचाई पर पहुंचने क बाद अब कच्चे तेल की कीमत में आई गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत में होने वाला प्रत्येक डॉलर का उतार-चढ़ाव भारत के राजकोष पर सीधा असर डालता है।

मयंक मोहन का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में आई गिरावट से करंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) में कमी आएगी। दरअसल, जब भी कच्चा तेल महंगा होता है तो भारत को डॉलर में अधिक भुगतान करना पड़ता है, जिससे देश का टेरेड डेफिसिट और करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ जाता है। ब्रेंट क्रूड के 98 डॉलर से नीचे और डब्ल्यूटीआई क्रूड के 89 डॉलर के स्तर पर आने से भारत के इंपोर्ट बिल में भी अरबों डॉलर की बचत होगी, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा और देश की वित्तीय स्थिति सुधरेगी।

इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमत में आई गिरावट से महंगाई पर भी काफी हद तक लगाम लगेगी। भारत में कच्चे तेल की कीमतें सीधे तौर पर पेट्रोल, डीजल और लॉजिस्टिक्स (परिवहन) की लागत को प्रभावित करती हैं। तेल सस्ता होने से माल ढुलाई की लागत घटेगी, जिससे सीधे तौर पर खाने-पीने की वस्तुओं और रोजमर्रा के सामानों की कीमतें नियंत्रित होंगी। ऐसा होने पर रिजर्व बैंक के लिए भी आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती का रास्ता साफ हो सकेगा।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के सस्ता होने से डॉलर की तुलना में रुपये को भी मजबूती मिलेगी। भारत को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारी मात्रा में क्रूड ऑयल को इंपोर्ट करना पड़ता है। इस इंपोर्ट के लिए ज्यादातर भुगतान डॉलर के जरिये होता है, जिसकी वजह से मुद्रा बाजार में रुपये पर दबाव बढ़ जाता है। इंपोर्ट बिल घटने से डॉलर की मांग कम होगी, जिसका असर भारतीय मुद्रा रुपये की मजबूती के रूप में सामने आया। इसके सात ही रुपये की विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) में भी स्थिरता आएगी।