नई दिल्ली, 24 सितंबर । भारत में अनुसंधान एवं विकास आधारित पादप विज्ञान और बीज कंपनियों के प्रमुख उद्योग संघ- फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआईआई) ने गुरुवार को कहा कि भारतीय सीड इंडस्ट्री का लक्ष्य 2035 तक ग्लोबल सीड ट्रेड में भारत की हिस्सेदारी को लगभग एक फीसद से बढ़ाकर 10 फीसद करना है। साथ ही, तिलहन और दालों जैसी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण फसलों के मामले में घरेलू नवाचार और आत्मनिर्भरता को मज़बूत करना इसका मकसद है।
एफएसआईआई ने यह जानकारी गुरुवार को यहां पत्रकार वार्ता में दी। नई दिल्ली में अपनी 10वीं सालाना आम बैठक के हिस्से के तौर पर आयोजित एफएसआईआई नॉलेज डे 2026 में लक्ष्य तय करते हुए संस्था ने कहा कि 3.6 अरब डॉलर वाली इस इंडस्ट्री की वैल्यू वर्ष 2030 तक पांच अरब डालर से अधिक होने की उम्मीद है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विज़न के मुताबिक ‘आत्मनिर्भरता’ में योगदान देगी।
एफएसआईआई के चेयरमैन और सवन्नाह बीज एमडी एवं सीईओ अजय राणा ने कहा, “भारत के पास ग्लोबल सीड मार्केट में एक बड़ी ताकत बनने के लिए ज़रूरी साइंस, टैलेंट और किसान मौजूद हैं। सरकार की पहल, जैसे कि ‘हाई-यील्डिंग सीड्स’ (ज़्यादा पैदावार वाले बीज) पर नेशनल मिशन, अहम कदम हैं। इंडस्ट्री रिसर्च में खासकर तिलहन और दालों के मामले में और ज़्यादा निवेश करने के लिए तैयार है।”
इंडस्ट्री की ज़रूरतों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “हमें बीज रेगुलेशन के लिए एक सिंगल नेशनल फ्रेमवर्क चाहिए, जिसमें तय समय-सीमा हो, नई किस्मों, गुणों और टेक्नोलॉजी के लिए साइंस-बेस्ड मंज़ूरी तेज़ी से मिले। साथ ही बौद्धिक संपदा की मज़बूत सुरक्षा हो, खासकर तिलहन और दालों के लिए। इससे कंपनियों को लंबे समय के लिए निवेश करने का भरोसा मिलेगा।”
इंडस्ट्री की मांगों के बारे में उन्होंने कहा, “हमें बीज रेगुलेशन के लिए एक सिंगल नेशनल फ्रेमवर्क चाहिए, जिसमें समय-सीमा तय हो, नई किस्मों, गुणों और टेक्नोलॉजी के लिए साइंस पर आधारित तेज़ी से मंज़ूरी मिले और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बौद्धिक संपदा संरक्षण की मज़बूत सुरक्षा हो। खासकर तिलहन और दालों के मामले में। इससे कंपनियों को लंबे समय के लिए निवेश करने का भरोसा मिलेगा।”
उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री का मानना है कि अनुसंधान एवं विकास के निवेश को अधिकाधिक बढावा देने में फ़ायदा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की जीडीपी से जुड़ा होता है। उन्होंने कहा, “जबकि विकसित देश अपनी डीजीपी का लगभग 3-4 फीसद अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करते हैं। इसमें हमारा निवेश एक प्रतिशत से भी कम है। रिसर्च से पता चलता है कि आरएंडडी पर खर्च किए गए हर रुपये में से 13 रुपये का रिटर्न मिल सकता है।”
राणा ने कहा कि इंडस्ट्री और सरकार को मिलकर काम करने की ज़रूरत है। खाने के तेल के इंपोर्ट पर निर्भरता का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “अगर सरकार और इंडस्ट्री साथ आएं, तो हम 10 साल से भी कम समय में खाने के तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकते हैं। इंडस्ट्री ने सरसों की ऐसी हाइब्रिड किस्में विकसित की हैं, जिनसे किसानों को प्रति एकड़ एक टन पैदावार मिलती है और उनकी आमदनी में काफ़ी बढ़ोतरी होती है, जबकि गेहूं से कम रिटर्न मिलता है। अगर हम गेहूं की जगह कुछ ज़मीन पर सरसों की खेती करें, तो इससे किसानों की आमदनी काफ़ी बढ़ेगी। साथ ही हम आत्मनिर्भर भी बनेंगे और आयात पर हमारी निर्भरता कम होगी।”
उन्होंने कहा कि बीटी काटन यानी कपास देश के किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। 99 प्रतिशत काटन बीटी काटन (कपास) में परिवर्तित हो गया है। मक्का का उत्पादन 12 मिलियन टन हो गया है जो अब 50 मिलियन टन तक पहुंच गया है। चावल का निर्यात 22 मिलियन टन हो रहा है। इस अवसर पर एफएसआईआई के अधिकारियों और अतिथियों ने सीड साइंस सोसाइटी के न्यूज लेटर को लांच किया।
कार्यक्रम में फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआईआई) के महानिदेशक डा. परेश वर्मा, सतगुरु मैनेमेंट कंसल्टेंट के अध्यक्ष एवं सीईओ डॉ. के विजयराघवन और प्रगतिशील किसान किशोर जायसवाल सहित एफएसआईआई के अन्य लोग मौजूद थे। ___________
